Register for the 2026 O&B Conference taking place Oct. 9-10 in Louisville, Kentucky.  Sign up now

श्वेत पत्र की मुख्य बातें

एशिया–प्रशांत क्षेत्र के समुदाय लंबे समय से पर्यावरणीय परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में रहे हैं — संसाधनों के गहरे दोहन के इतिहास और वैश्विक डिकार्बोनाइज़ेशन के तहत “जलवायु उपनिवेशवाद” के नए रूपों का सामना करते हुए। यह श्वेत पत्र, एशिया–प्रशांत न्यायपूर्ण संक्रमण: एशिया–प्रशांत जलवायु, कृषि-खाद्य, और पर्यावरणीय संगठनों की गतिविधियों, रणनीतियों और आवश्यकताओं का मूल्यांकन, जो यूसी बर्कले के अदरिंग एंड बिलॉन्गिंग इंस्टीट्यूट के ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम द्वारा तैयार किया गया है, यह जांच करता है कि क्षेत्रीय संगठन कैसे न्यायसंगत, स्थानीय रूप से आधारित, और क्षतिपूर्तिकारक जलवायु संक्रमण को आगे बढ़ा रहे हैं।

इस अध्ययन में छह उपक्षेत्रों में 601 देशों और क्षेत्रों में फैले 796 संगठनों की लिखित सामग्रियों का विश्लेषण शामिल है, जिसमें यह देखा गया है कि जस्ट ट्रांज़िशन (JT / न्यायपूर्ण परिवर्तन) और इससे जुड़े ढाँचे कैसे लागू किए जाते हैं; और 60 संगठनों का एक क्षेत्रीय सर्वे शामिल है, जिसमें उनके केंद्रित समुदायों, रणनीतियों, ढाँचों, और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर विचारों को समझा गया है। अध्ययन से पता चलता है कि भले ही “जस्ट ट्रांज़िशन” जैसी स्पष्ट भाषा औद्योगिक या संसाधन-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में अधिक पाई जाती है, लेकिन जलवायु न्याय, खाद्य संप्रभुता, आदिवासी आत्मनिर्णय, और कृषि सुधार जैसे समान सिद्धांत हर उपक्षेत्र में मौजूद हैं।

मुख्य निष्कर्ष:

  • साझा लक्ष्य: संसाधन शासन का लोकतंत्रीकरण, आजीविकाओं की सुरक्षा, और पर्यावरणीय तंत्रों की बहाली।

  • क्षेत्रीय प्रचलन (पैटर्न):
    • मध्य एशिया: राज्य-नेतृत्व वाली अक्षय ऊर्जा और जल पहलों पर ध्यान।
    • पूर्वी एशिया: ऊर्जा न्याय और खाद्य संप्रभुता पर लक्ष्य।
    • ओशिनिया: उपनिवेशमुक्ति से जुड़े जलवायु न्याय पर लक्ष्य।
    • दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया: कृषि और श्रम न्याय पर लक्ष्य।
    • पश्चिम एशिया: जलवायु कार्य जो संप्रभुता और श्रमिक अधिकारों से जुड़ा है।
  • समुदायों की सेवा: आम जनता, आदिवासी जनसमुदाय, ग्रामीण समुदाय, कम आय वाले लोग, महिलाएँ, युवा, किसान और मछुआरे।
  • रणनीतिक लक्ष्य: अल्पकालिक समाधान के रूप में खाद्य संप्रभुता को आगे बढ़ाना, और दीर्घकालिक समाधान के रूप में अर्थव्यवस्थाओं को स्थिरता और स्वायत्तता की ओर परिवर्तित करना।
  • साझेदारी पर आलोचना: ग्लोबल नॉर्थ के संस्थान अक्सर सत्ता असंतुलन को बनाए रखते हैं; क्षेत्रीय संगठन सीधे और लचीले निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, और नीति स्वायत्तता की मांग करते हैं।

एशिया–प्रशांत में न्यायपूर्ण संक्रमण पहले से ही चल रहा है, जिसे हजारों जमीनी और क्षेत्रीय संगठनों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। वास्तविक वैश्विक जलवायु न्याय तभी संभव है जब ग्लोबल नॉर्थ दोहन आधारित साझेदारियों से हटकर क्षतिपूर्ति साझेदारी की ओर बढ़े — जिसमें स्थानीय नेतृत्व को केंद्र में रखा जाए, संसाधनों का पुनर्वितरण किया जाए, और एकजुटता, पारस्परिकता, और सुधार को बनाए रखा जाए।

निष्कर्ष

एशिया-प्रशांत देशों और क्षेत्रों के नामों का मानचित्र

(छवि बढ़ाकर देखें)


अधिकांश संगठनों ने बताया कि वे राष्ट्रीय स्तर (78.3%) और स्थानीय स्तर (76.6%) पर काम करते हैं

(छवि बढ़ाकर देखें)

1

अधिकांश संगठनों ने बताया कि वे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अन्य संगठनों के साथ काम करते हैं (73.3%)

(छवि बढ़ाकर देखें)

2

अधिकांश संगठनों ने बताया कि वे मुख्य रूप से आम जनता (46.6%), ग्रामीण जनसंख्या (41.6%), आदिवासी, जाति या जातीयता आधारित समूह (38.3%), और किसान (38.3%) की सेवा करते हैं

(छवि बढ़ाकर देखें)

3

अधिकांश संगठनों ने बताया कि वे जिन प्रमुख जलवायु समस्याओं को लेकर चिंतित हैं, वे हैं प्रदूषण (50%), जल की कमी (43.3%), और सूखा (41.6%)

(छवि बढ़ाकर देखें)


अधिकांश संगठनों ने बताया कि वे जिन प्रमुख सामाजिक-पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर चिंतित हैं, वे हैं खाद्य असुरक्षा (48.3%), शासन और निर्णय लेने की प्रक्रियाएँ (35%), और वनों की कटाई (33.3%)

(छवि बढ़ाकर देखें)

 


अधिकांश संगठनों ने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण अल्पकालिक समाधान खाद्य संप्रभुता को बढ़ाना है (51.6%), और सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक समाधान साझा स्वामित्व मॉडल, क्लोज़्ड-लूप सप्लाई चेन विकसित करना, और आर्थिक प्रणालियों को पारिस्थितिक और सामाजिक कल्याण के लिए पुनः डिज़ाइन करना है (43.3%)

  • स्वल्पकालिक समाधान
  • दीर्घकालिक समाधान

(छवि बढ़ाकर देखें)

6

जवाब देने वाले आधे संगठन अपनी अल्पकालिक और दीर्घकालिक समाधानों को आगे बढ़ाने के लिए जन-जागरूकता बढ़ाने में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं (50%)

(छवि बढ़ाकर देखें)


अधिकांश संगठनों ने बताया कि वे अपने कार्य को निर्देशित करने के लिए जिस विशेष ढाँचे या अवधारणा का उपयोग करते हैं, वह है संरक्षण (36.6%) 

(छवि बढ़ाकर देखें)


अधिकांश संगठनों ने बताया कि उन्हें वित्तीय सहायता की आवश्यकता है (91.6%), और प्रशिक्षण की—जैसे आईटी, अनुसंधान और विकास, फंडिंग प्राप्ति आदि (56.6%)

(छवि बढ़ाकर देखें)


अधिकांश संगठनों ने बताया कि एशिया-प्रशांत पर्यावरण, कृषि-खाद्य, और जलवायु संगठनों को अधिक प्रभावी रूप से समर्थन देने के लिए, ग्लोबल नॉर्थ की एनजीओ को बिना शर्त फंडिंग देनी चाहिए (46.6%) और अपने देशों में नीतियों और प्रथाओं को बदलने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र एवं उसके लोगों की भूमि, संसाधनों और श्रम के शोषण और दोहन को कम किया जा सके (35%)

(छवि बढ़ाकर देखें)

10


निष्कर्ष: एशिया–प्रशांत क्षेत्र में क्षतिपूर्तक न्यायपूर्ण संक्रमण की ओर

यह सर्वे यह दर्शाता है कि एशिया–प्रशांत क्षेत्र कम-कार्बन विकास के प्रतिस्पर्धी भविष्य के भौगोलिक और राजनीतिक केंद्र में स्थित है। उपनिवेशवादी दोहन, संरचनात्मक निर्भरता, और ऋणदाता प्राथमिकताओं द्वारा नियंत्रित विकास वित्त के लंबे इतिहास ने कई देशों और क्षेत्रों को सीमित वित्तीय नीतिगत विकल्पों और गहरी असमानताओं के साथ छोड़ दिया है। वैश्विक हरित संक्रमण से खनिजों, औद्योगिक क्षमता, और ग्रिड अवसंरचना की मांग बढ़ने के साथ यह क्षेत्र नए प्रकार के दोहन—जिसे “सस्टेनेबल” कहकर प्रस्तुत किया जाता है—का प्रमुख केंद्र बन गया है, जो पुराने अन्यायों को हरित भाषा में दोबारा पैदा कर सकता है। विदेशी राज्य-समर्थित पूंजी, बहुराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाएँ, और घरेलू राज्य-नेतृत्व वाला औद्योगिकीकरण मिलकर ऐसे संक्रमण क्षेत्र बनाते हैं, जहाँ अक्सर सामुदायिक कल्याण, भूमि अधिकार, और पर्यावरणीय अखंडता के बजाय आपूर्ति-शृंखला की समयसीमा और भू-राजनीतिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।

इसके जवाब में, ग्लोबल साउथ द्वारा संचालित एक व्यापक और अधिक समन्वित राजनीतिक आंदोलन एक क्षतिपूर्तक दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रहा है। यह आंदोलन व्यावहारिक मांगों (ऋण राहत, अनुदान-आधारित जलवायु वित्त, स्थानीय रूप से नियंत्रित मूल्य-सृजन) को नैतिक और विधिक दावों (ऐतिहासिक उत्सर्जनों और उपनिवेशवादी कब्जे के लिए क्षतिपूर्ति, विभेदित जिम्मेदारी की मान्यता)2 के साथ जोड़ता है। पिछले दो वर्षों में ये मांगें संस्थागत स्तर और जन-आंदोलनों दोनों में दिखाई दी हैं: पैन-अफ़्रीकन क्लाइमेट जस्टिस एलायंस जैसी क्षेत्रीय गठबंधनों और सहयोगी ग्लोबल साउथ नेटवर्कों ने ऋण माफी, क्षतिपूर्ति और न्यायपूर्ण संक्रमण को जोड़ने वाले अभियान शुरू किए हैं; IMF और विश्व बैंक की बैठकों के दौरान बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और विरोध हुए हैं; और एक बाध्यकारी, बहुपक्षीय ऋण-पुनर्गठन तंत्र की नागरिक समाज की मांगें तेज़ हुई हैं। ये विकास दर्शाते हैं कि क्षतिपूर्ति केवल एक नैतिक विचार नहीं है—इसे वित्तीय ढाँचे और शर्तों में वास्तविक बदलाव की ठोस मांग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

संस्थागत बदलाव असमान लेकिन महत्वपूर्ण रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ‘हानि-और-क्षति’ वित्तपोषण तंत्रों का निर्माण और संचालन यह आंशिक संस्थागत स्वीकारोक्ति है कि कमजोर देशों और क्षेत्रों को ऐसी नई वित्तीय धाराओं की आवश्यकता है जो ऋण-निर्भरता को न दोहराएँ। फिर भी, विशेषज्ञ यह बताते हैं कि केवल हानि-और-क्षति क्षतिपूर्ति नहीं है; इसे अनुदान-आधारित अनुकूलन वित्त, ऋण राहत, और बड़े संरचनात्मक सुधारों के साथ जोड़ा जाना चाहिए जो निम्न-आय वाले देशों पर वित्तीय प्रभुत्व को समाप्त करें। इसी तरह, विकास वित्त संस्थानों—विश्व बैंक, IMF, G20—पर दबाव बढ़ा है कि सिर्फ अधिक धन नहीं, बल्कि तरीके बदलें: कम ऋण, अधिक अनुदान, जलवायु/जैव विविधता के लिए ऋण-अदलाबदल, और ऋण समाधान प्रक्रियाओं में पारदर्शिता व भागीदारी। कई निम्न-आय देशों और क्षेत्रों में ऋण भुगतान का बोझ जलवायु वित्त से अधिक हो जाने के प्रमाण ने शर्तयुक्त ऋण और कठोर नीतियों की आलोचना को और तेज़ कर दिया है।

इसी समय, महत्वपूर्ण खनिजों और औद्योगिक क्षमता पर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा क्षेत्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित कर रही है। उच्च-आय वाले देशों की राज्य-समर्थित निवेश नीतियाँ, रणनीतिक भंडारण, और "डी-रिस्किंग" नीतियाँ एशिया–प्रशांत में खनन, रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग परियोजनाओं को तेज कर रही हैं।3 इससे दो विरोधाभासी परिणाम निकलते हैं: यह क्षेत्रीय औद्योगिकीकरण और मूल्य-सृजन के अवसर पैदा कर सकता है, लेकिन साथ ही यह ऐसे हस्तक्षेपों की तीव्रता भी बढ़ाता है जो समुदायों के विस्थापन और पर्यावरणीय-सामाजिक लागतों के बाहरीकरण का जोखिम पैदा करते हैं। विशेष रूप से, जब खनिज आपूर्ति शृंखलाओं का सैन्यीकरण या सुरक्षा-करण होता है—जहाँ पहुँच और विश्वसनीयता न्यायसंगत वितरण से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है—तो देश और क्षेत्र वैविध्यपूर्ण विकास के बजाय अल्पकालिक दोहन और अस्थिर विकास चक्रों में फँस सकते हैं।

इन परिस्थितियों—ऋण निर्भरता, खनिज भू-राजनीति, और उभरती क्षतिपूर्ति राजनीति—और इस सर्वे के निष्कर्षों से एशिया–प्रशांत क्षेत्र के लिए नीति और शोध हेतु तीन प्रमुख निष्कर्ष निकलते हैं:

  1. क्षतिपूर्ति को दान नहीं, संरचनात्मक सुधार के रूप में समझना चाहिए।
    यह दृष्टिकोण ‘सहायता’ से ‘जिम्मेदारी और संरचनात्मक पुनर्वितरण’ की ओर बहस को पुनः परिभाषित करता है। इसका अर्थ है कि नीति-निर्माताओं को आकस्मिक वित्तपोषण से आगे बढ़कर ऐसे तंत्र विकसित करने चाहिए जो ऋण बोझ को कम करें (ऋण माफी, जलवायु के लिए ऋण-अदलाबदल), अनुदान वित्त बढ़ाएँ, और प्रभावित समुदायों के निर्णयकारी अधिकारों को संस्थागत रूप दें। क्षतिपूर्ति का उद्देश्य वित्तीय संप्रभुता को बहाल करना और सामाजिक व हरित अवसंरचना में सार्वजनिक निवेश के लिए वित्तीय स्थान बनाना होना चाहिए।
  2. केवल कच्चे दोहन के बजाय स्थानीय मूल्य-सृजन और शासन को प्राथमिकता दें।
    न्यायसंगत संक्रमण तभी संभव है जब नीतियाँ स्थानीय प्रकिया, तकनीकी हस्तांतरण, और सामुदायिक लाभ-साझेदारी को प्राथमिकता दें, न कि केवल विदेशी मूल्य शृंखलाओं के लिए कच्चे खनिज निर्यात को। इसके लिए स्थानीय सामग्री नियम, पारदर्शी अनुबंध, मजबूत भूमि अधिकार और FPIC (Free, Prior, and Informed Consent / मुक्त, पूर्व, व सजग सहमती) सुरक्षा, और ऐसी क्षेत्रीय औद्योगिक रणनीतियाँ आवश्यक हैं जो भू-राजनीतिक सौदों के प्रभाव से मुक्त हों। विकास वित्त संस्थानों को ऋण-चालित मॉडलों से हटकर स्थानीय क्षमताओं और पर्यावरणीय सुरक्षा को मजबूत करने वाले अनुदान और भागीदारी साधनों की ओर बढ़ना चाहिए।
  3.  जलवायु वित्त को ऋण और शासन सुधार से जोड़ना होगा।
    क्षतिपुर्तक वित्त को वास्तविक बनाने के लिए जलवायु वित्तपोषण को ऋण राहत और ऐसे शासन सुधारों से जोड़ना आवश्यक है जो भविष्य की अधीनता को रोकें। इसमें जलवायु के लिए ऋण-अदलाबदल, टिकाऊ ऋण-सेवा सीमाएँ, और ऐसे ढाँचे शामिल हैं जो निजी बांडधारकों को भी समायोजन लागत साझा करने पर बाध्य करें। बहुपक्षीय स्तर पर, IMF/विश्व बैंक शासन में ग्लोबल साउथ की अधिक प्रतिनिधित्व और नए अंतरराष्ट्रीय साधनों (जैसे UN ऋण सम्मेलन या हानि-और-क्षति पुनर्भरण तंत्र) की आवश्यकता होगी जो जवाबदेही संस्थागत करे और पारदर्शी विवाद समाधान कारक हो।

अंततः, जलवायु क्षतिपूर्ति की नैतिक और राजनीतिक मांगें क्षेत्र में एकजुटता की राजनीति की परीक्षा लेती हैं। यदि क्षतिपूर्ति को केवल प्रतीकात्मक नहीं रहना है, तो इसे उन कानूनी-आर्थिक संरचनाओं को बदलना होगा जो दोहन और निर्भरता को पुनः पैदा करती हैं। इसके लिए केवल तकनीकी वित्तीय परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक गठबंधन—मजदूर आंदोलनों, आदिवासी समुदायों, ऋण-विरोधी समूहों, और परिवर्तनकारी नीतियों के बीच समन्वय आवश्यक हैं — जो वैश्विक नैतिक दावों को लागू करने योग्य नीति और संस्थागत परिवर्तनों में बदल सके। महत्वपूर्ण खनिजों, राज्य पूँजी, और सक्रिय सामाजिक आंदोलनों के संगम पर स्थित एशिया–प्रशांत क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील और निर्णायक है: एशिया–प्रशांत क्षेत्र क्षतिपूर्ति संबंधी मांगों को कैसे विनिमय करता है, इससे यह तय होगा कि ऊर्जा संक्रमण बहाली और लोकतांत्रिक विकास का माध्यम बनेगा या एक बार फिर ऐतिहासिक अन्यायों को दोहराएगा।

जैसे-जैसे न्यायपूर्ण संक्रमण और अन्य सुधारात्मक जलवायु कार्रवाई के ढाँचे ग्लोबल नॉर्थ की प्रमुख संस्थाओं में फैल रहे हैं, यह जोखिम है कि इन ढाँचों और उनकी रूपांतरणकारी शक्ति का क्षरण हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि एशिया–प्रशांत जलवायु, कृषि-खाद्य, और पर्यावरणीय संगठनों के साथ सहयोग करते हुए ग्लोबल नॉर्थ देश, संगठन और संस्थाएँ इन बहुस्तरीय प्रयासों को गंभीरता और निरंतरता से उठाएँ—अपनी ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकारते हुए और वैश्विक न्यायपूर्ण संक्रमण को आगे बढ़ाते हुए।


लेखक
एलसादिग एलशेख
हुसैन अयाज़ी, पीएच.डी.
बसीमा सिसेमोर

छात्र शोधकर्ता
एबिगेल विक्टोरिया मलाकुन
हुदा अब्देलनूर

सर्वे अनुवाद
बासेम फ़याद — अरबी
सूर्या उदयकुमार — हिंदी
हस्रियादी मसालम — इंडोनेशियाई
सीएमएम ट्रांसलेशन — मंदारिन चीनी, थाई, और वियतनामी

कॉपीएडिटिंग 
मार्क अबिज़ैद

डिज़ाइन और लेआउट
एरफ़ान मोरादी

विज़ुअल्स
एरफ़ान मोरादी

कवर आर्टवर्क
साधना प्रसाद, ArtistsForClimate.org के लिए। यह आर्टवर्क CC-BY-NC-SA 4.0 लाइसेंस के तहत इस प्रकाशन के लिए अनुकूलित और वितरित किया गया है।

समीक्षक
हम सर्वे प्रश्नों की समीक्षा में समर्थन के लिए एंजेला सादे, अयनाबत यायलिमोवा, और हस्रियादी मसालम का धन्यवाद करते हैं। हम अदरिंग एंड बिलॉन्गिंग इंस्टीट्यूट के स्टीफन मेनेन्डियन का भी श्वेत पत्र की समीक्षा में उनके समर्थन के लिए आभार व्यक्त करते हैं।

 

उद्धरण
एलसादिग एलशेख, हुसैन अयाज़ी, और बसीमा सिसेमोर, “एशिया-प्रशांत न्यायपूर्ण संक्रमण: एशिया-प्रशांत जलवायु, कृषि-खाद्य, और पर्यावरणीय संगठनों की गतिविधियों, रणनीतियों और आवश्यकताओं का मूल्यांकन” (बर्कले, कैलिफ़ोर्निया: अदरिंग एंड बिलॉन्गिंग इंस्टीट्यूट, दिसंबर 2025), belonging.berkeley.edu/asia-pacific-just-transitions.

 


अदरिंग एंड बिलॉन्गिंग इंस्टीट्यूट के बारे में

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले (UC Berkeley) का अदरिंग एंड बिलॉन्गिंग इंस्टीट्यूट, जिसे पहले हास इंस्टीट्यूट फॉर ए फ़ेयर एंड इंक्लूसिव सोसाइटी के नाम से जाना जाता था। शोधकर्ताओं, सामुदायिक नेताओं, नीति-निर्माताओं, कलाकारों और संचार विशेषज्ञों का एक जीवंत केंद्र है। यह संस्थान हाशिए पर रहने वाले समुदायों से जुड़े शोध, नीतिगत पहल और व्यावहारिक कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करता है। इंस्टीट्यूट नवाचारी नैरेटिव, संचार और सांस्कृतिक रणनीतियों के माध्यम से वंचितीकरण और सामूहिक न्याय से जुड़े सार्वजनिक विमर्श को नए सिरे से गढ़ने का प्रयास करता है तथा उन मुद्दों का जवाब देने की कोशिश करता हैं।

यह सारांश अदरिंग एंड बिलॉन्गिंग इंस्टीट्यूट के ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार एक श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) पर आधारित है। इस श्वेत पत्र में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि जलवायु न्याय से जुड़े ऐसे साझेदारी मॉडल विकसित किए जाने की आवश्यकता है, जो चाहे जिस भी ढाँचे में काम करें, न्यायपूर्ण संक्रमण (जस्ट ट्रांज़िशन) को बढ़ावा दें और, जहाँ जस्ट ट्रांज़िशन के ढाँचे का प्रयोग हो, वहाँ उसकी परिवर्तनकारी शक्ति को सुरक्षित रखें। यह यह श्वेत पत्र एशिया–प्रशांत क्षेत्र के संगठनों के उद्देश्यों, रणनीतियों और गतिविधियों को समर्थन देने की आवश्यकता को रेखांकित करता है तथा जिन समुदायों में वे काम करते हैं, उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ज़रूरतों को गंभीरता से लेने की बात कहता है।

  • 1 हमारे सर्वे विश्लेषण और सर्वे में उन क्षेत्रीय देशों और क्षेत्रों को भी शामिल किया गया था जो संयुक्त राष्ट्र के “एशिया-प्रशांत समूह के सदस्य राज्यों के क्षेत्रीय समूह” से परे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देश, हांगकांग और निउए जैसे स्व-शासित क्षेत्र, तथा फ़िलिस्तीन और ताइवान जैसे गैर-संयुक्त राष्ट्र सदस्य राज्य शामिल हैं। इन देशों और क्षेत्रों को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में न्यायपूर्ण संक्रमण में उनके भू-राजनीतिक महत्व और योगदान के कारण शामिल किया गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम अपने सर्वे में भाग लेने के लिए डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया में किसी भी संगठन का शोध या उनसे संपर्क नहीं कर पाए।
  • 2Táíwò, Olúfẹ́mi O. रीकन्सिडरिंग रिपेरेशन्स: व्हाय क्लाइमेट जस्टिस एंड कंस्ट्रक्टिव पॉलिटिक्स आर नीडेड इन द वेक ऑफ स्लेवरी एंड कोलोनियलिज़्म. न्यूयॉर्क: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2022.
  • 3ट्रांसनेशनल इंस्टिट्यूट. जियोपॉलिटिक्स ऑफ कैपिटलिज़्म, स्टेट ऑफ पावर 2025. 2025. https://www.tni.org/en/publication/geopolitics-of-capitalism